Tuesday, October 8, 2019

मैं ख़याल हूँ किसी और का

मैं ख़याल हूँ किसी और का मुझे सोचता कोई और है |
सर-ए-आइना मेरा अक्स है पस-ए-आइना  कोई और है ||

मैं किसी के दस्त-ए-तलब मैं हूँ तो किसी के हर्फ़-ए-दुआ में हूँ |
में नसीब हूँ किसी और का मुझे मांगता कोई और है ||

अजब ऐतबार-और-बे ऐतबारी के दरमियान है ज़िन्दगी |
में क़रीब हूँ किसी और के मुझे जानता कोई और है ||


तुझे दुश्मनो की खबर न थी, मुझे दोस्तों का पता नहीं |
तेरी दास्ताँ कोई और थी, मेरा वाकिया कोई और है ||

वही मुंसिफ़ों की रिवायतें वही फैसलों की इबारतें
मेरा जुर्म तो कोई और था पर मेरी सजा कोई और है

कभी लौट ऍन तो पूछना नहीं, देखना उन्हें ग़ौर से |
जिन्हे रास्ते में खबर हुए के ये रास्ता कोई और है  ||

मेरी रौशनी तेरे खड्ड-ओ-खाल से मुख्तलिफ तो नहीं मगर |
तू क़रीब आ तुझे देख लून तू वही है या कोई और है ||

जो मेरी रियाज़त-ए-नीम-शब् को “सलीम” सुबह न मिल सकी
तो फिर इस के माने तो ये हवाएं, के यहां खुदा कोई और है