Monday, November 25, 2013

dooriya nazdeekiyaan (दूरियां नज़दीकियां)

मैं अपनों में ही, जब पराया  हुआ
गैरों का आसान सहारा क्या खूब हुआ
अपनों का दर्द क्या ख़ाक़  सम्झा, ए दिल
गैरों  का मैं ने, क्या खूब  समेटा मन ही मन

वो अपने ही थे मेरे चैन गवाए
जो पराये हमेशा, मुझे आज़माए
परायों से दूर, दौड़ता हूँ अभी
जब  वो मुझे, निकट से दूर करते नहीं ||

पराये या अपने खूब समझ  गए मुझे |
मेरी नज़दीकियों के खोख्लेपनोंको
एहसास हुआ, उन्हें ये नज़दीकियां,
जब दूरियाँ हुयी कम से कम.. कम से कम ||

Thursday, November 7, 2013

Masoom chehre (मासूम चेहरे )

मासूम चेहरों के आस पड़ोस, भटका मासूमियत  
वो  सींचा सिंचाया संग उगाया, अनगिनत गुलबे बहार  
मौसमे बहार क्या कायम रहा, उजड़ा फिर उजाड़ा गया,  बार बार शाम ए सहर में | 
…आज़माया इसे, कभी मै  ने, कभी तू  ने और कभी उस ने, 
....................अनजान था बागबान अभी||   

अनगिनत साल, किस्सा ये कायम रहा, और है कायम अब भी,  
वो सींचे सिंचाये, भीतर ही भीतर, अंदर से बाहर, कौन जाने कब तक? 
मासूमियत अपने जिद पे है  कायम क्यूँ, क्या कोई समझ पायेगा कभी?  
…आज़माता हूँ ये कभी मै, हाँ  तेरा है रोज़ाना, मुझे गुस्ताखी माफ़, मगर| 
...................  अब क्यूँ जान  कर भी अनजान है बागबान??