मासूम चेहरों के आस पड़ोस, भटका मासूमियत
वो सींचा सिंचाया संग उगाया, अनगिनत गुलबे बहार
मौसमे बहार क्या कायम रहा, उजड़ा फिर उजाड़ा गया, बार बार शाम ए सहर में |
…आज़माया इसे, कभी मै ने, कभी तू ने और कभी उस ने,
....................अनजान था बागबान अभी||
अनगिनत साल, किस्सा ये कायम रहा, और है कायम अब भी,
वो सींचे सिंचाये, भीतर ही भीतर, अंदर से बाहर, कौन जाने कब तक?
मासूमियत अपने जिद पे है कायम क्यूँ, क्या कोई समझ पायेगा कभी?
…आज़माता हूँ ये कभी मै, हाँ तेरा है रोज़ाना, मुझे गुस्ताखी माफ़, मगर|
................... अब क्यूँ जान कर भी अनजान है बागबान??
वो सींचा सिंचाया संग उगाया, अनगिनत गुलबे बहार
मौसमे बहार क्या कायम रहा, उजड़ा फिर उजाड़ा गया, बार बार शाम ए सहर में |
…आज़माया इसे, कभी मै ने, कभी तू ने और कभी उस ने,
....................अनजान था बागबान अभी||
अनगिनत साल, किस्सा ये कायम रहा, और है कायम अब भी,
वो सींचे सिंचाये, भीतर ही भीतर, अंदर से बाहर, कौन जाने कब तक?
मासूमियत अपने जिद पे है कायम क्यूँ, क्या कोई समझ पायेगा कभी?
…आज़माता हूँ ये कभी मै, हाँ तेरा है रोज़ाना, मुझे गुस्ताखी माफ़, मगर|
................... अब क्यूँ जान कर भी अनजान है बागबान??
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